
विपक्ष का ‘ताज’, आखिर किसके सिर सजेगा सहरा ?
निम्बाहेड़ा। क्या निम्बाहेड़ा नगर परिषद में कांग्रेस अपने सबसे बड़े सियासी दांव से कोई बड़ा उलटफेर करने जा रही है ? चुनाव के नतीजे भले ही थम गए हों, लेकिन शहर की गलियों से लेकर राजनीतिक चौपालों तक इन दिनों बस एक ही गूंज है “लम्बू-छोटू” की चर्चित जुगलबंदी और नेता प्रतिपक्ष की रेस ! 17 पार्षदों की फौज के साथ विपक्ष की रीढ़ मजबूत करने के लिए कांग्रेस को एक ऐसे ‘कैप्टन’ की तलाश है, जो सत्ता पक्ष की रातों की नींद उड़ा सके। लेकिन इस ‘मास्टरस्ट्रोक’ को खेलने से पहले पार्टी को चार दिग्गजों के सियासी बायोडाटा के कड़े इम्तिहान से गुजरना होगा।
रेस में कौन-किस पर भारी ?
एक तरफ जहां पूर्व चेयरमैन सुभाष शारदा का लंबा राजनीतिक तजुर्बा उनके पक्ष में खड़ा है, वहीं गीता वैष्णव की मजबूत राजनीतिक पृष्ठभूमि भी कम आंकने योग्य नहीं है। दूसरी तरफ,ओबीसी वर्ग से आने वाले ऊर्जावान युवा रवि सोनी का आक्रामक अंदाज़ सत्तापक्ष के खिलाफ सीधा मोर्चा खोलने की क्षमता रखता है। वहीं,अल्पसंख्यक समुदाय में गहरी पैठ और मजबूत पकड़ रखने वाले जकी अहमद (‘गुड्डू भाई’) इस रेस में अपनी पुख्ता दावेदारी पेश कर रहे हैं। यें चेहरे बेहद दमदार हैं और उनके समर्थक पूरी तरह एक्टिव हैं। ऐसे में कांग्रेस आलाकमान किस पर दांव खेलेगा, यह फैसला निम्बाहेड़ा की राजनीति की अगली दिशा तय करेगा !
सियासी समीकरण ,संतुलन बिठाना टेढ़ी खीर
कांग्रेस खेमे के 17 पार्षदों में से 7 पार्षद अकेले मुस्लिम समाज से ताल्लुक रखते हैं। ऐसे में नेता प्रतिपक्ष के चयन में जातिगत, सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन साधना पार्टी के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है । यह पद महज एक ओहदा नहीं है, बल्कि नगर परिषद के सदन में जनता की आवाज को बुलंद करने की मुख्य जिम्मेदारी है । शहर के विकास कार्यों, बजट और जनहित के तीखे मुद्दों पर विपक्ष की आक्रामक भूमिका इसी कुर्सी के इर्द-गिर्द घूमती है। इसके अलावा,आगामी सियासी जमीन तैयार करने के लिहाज से भी यह पद बेहद अहम माना जा रहा है।
क्या गुल खिलाएगी ‘लम्बू-छोटू’ की जुगलबंदी ?
इन सबके बीच, राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा स्थानीय स्तर पर चर्चा का केंद्र बनी ‘लम्बू’ और ‘छोटू’ की खास जुगलबंदी की है। सियासी पंडितों का मानना है कि इस समीकरण के तहत किसी ऐसे नाम पर मुहर लग सकती है, जो ‘छोटू जी’ का बेहद खास हो और ‘लम्बू जी’ की बिसात पर सही तालमेल बिठाकर शहर की समस्याओं पर आक्रामक रूप से दहाड़ सके।इस सियासी तिकड़म का असर आने वाले समय में सभापति और नेता प्रतिपक्ष के बीच के समीकरणों पर साफ नजर आएगा। फिलहाल चर्चाओं का बाजार गर्म है, लेकिन अंतिम मुहर कांग्रेस आलाकमान को ही लगानी है।
अब देखना यह दिलचस्प होगा कि पार्टी पुराने अनुभव को तरजीह देती है, किसी जुझारू युवा चेहरे को आगे बढ़ाती है या फिर इन अंदरखाने के सियासी समीकरणों से कोई नया नाम निकालकर सबको चौंका देती है!




