जड़ें सूख गईं, रिश्ते मर गए ,एक माँ का विलाप !
रेंगती मां,चारपाई पर तड़पती 90 वर्षीय बुआ, बेटी आँसू पीकर साफ करती गंदगी…… .

यह केवल एक कहानी नहीं, बल्कि समाज के उस खोखलेपन की चीख है जिसे हम ‘प्रगति’ कह रहे हैं। चंदा देवी का दर्द उन तमाम माता-पिता का दर्द है जो अपनी पूरी उम्र बच्चों के भविष्य की नींव भरने में लगा देते हैं, पर अंत में खुद ही बेघर हो जाते हैं।
चित्तौड़गढ़/सावा । जमाना बदला, तकनीक बदली, शहरों की ऊँची इमारतें आसमान छूने लगीं, लेकिन अफ़सोस कि इंसानियत का भूगोल ही बदल गया। रिश्तों की गर्माहट अब मोबाइल की स्क्रीन में कैद होकर रह गई है और घरों के आँगन में पलने वाली संवेदनाएँ धीरे-धीरे पत्थर बनती जा रही हैं। हम अक्सर कहते हैं कि जिंदगी एक सीढ़ी है, जहाँ पुराना पायदान घिस जाए तो उसे बदल दिया जाता है। लेकिन सच तो यह है कि जिंदगी कोई सीढ़ी नहीं, बल्कि एक विशाल पेड़ है। उस पेड़ की जड़ें हमारे माता-पिता होते हैं, जिनकी तपस्या, त्याग और संघर्ष के सहारे ही हमारी शाखाएँ आसमान तक पहुँचती हैं। अगर वही जड़ें काट दी जाएँ, तो शिखर पर लहराती टहनियाँ भी ज्यादा दिन हरी नहीं रह सकतीं। जिस घर में बुजुर्गों की दुआएँ सूख जाती हैं, वहाँ सुख-सुविधाओं के महल भी भीतर से वीरान हो जाते हैं।
इसलिए बड़ी ही विनम्रता और आदर से मैं समाज से पूछना चाहता हूँ कि जिन बच्चों की एक मुस्कान के लिए एक पिता अपनी पूरी जिंदगी खपा देता है… जो अपनी इच्छाओं का गला घोंटकर उनकी हर ख्वाहिश पूरी करता है… जो खुद फटे कपड़ों में रहकर बच्चों को नया भविष्य पहनाता है… वही बच्चे आखिर पिता की आँखें बंद होते ही माँ की आँखों से रोशनी क्यों छीन लेते हैं ? क्यों वही माँ, जिसने रात-रातभर जागकर उन्हें बुखार में सीने से लगाया था, बुढ़ापे में बोझ लगने लगती है ? क्यों जिन हाथों ने उंगली पकड़कर चलना सिखाया, वही हाथ बुढ़ापे में सहारे को तरस जाते हैं ? यह सिर्फ एक माँ का दर्द नहीं, यह उस समाज का आईना है जहाँ तरक्की तो बढ़ी, लेकिन रिश्तों की आत्मा कहीं पीछे छूट गई।
शमशान की राख अभी ठंडी भी न हुई थी !
जिस घर को चंदा देवी के पति ने अपनी बहन के घर को पाई-पाई जोड़कर संवारा था, जहाँ बच्चों की किलकारियां गूंजी थीं, उसी घर में सन्नाटा पसर गया । पिता की चिता की आग अभी पूरी तरह ठंडी भी नहीं हुई थी, कपाल क्रिया के संस्कार की स्याही अभी सूखी भी नहीं थी कि बेटों ने अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया । “जिन हाथों ने बचपन में बेटों को उंगली पकड़कर चलना सिखाया था, आज वही हाथ खाली थे। बड़ा बेटा और छोटा बेटा—दोनों ने घर की चौखट ऐसे लांघी जैसे पीछे कोई रिश्ता नहीं, बल्कि कोई बोझ छूट रहा हो।”
भगवा चोला और पत्थर दिल !
विडम्बना देखिये, एक बेटा जो धर्म और आध्यात्म का चोला ओढ़े ‘भगवाधारी’ बना फिरता है, वह उस बुनियादी धर्म को ही भूल गया जिसे ‘पितृ धर्म’ और ‘मातृ सेवा’ कहते हैं। जिस माँ ने नौ महीने अपनी कोख में रखकर उसे जीवन का प्रकाश दिखाया, आज वही बेटा उसे अंधकार में छोड़कर चला गया। क्या वह ईश्वर जिसे वो पूजता है, ऐसी पत्थरदिली को स्वीकार करेगा ?
बेटी……… ममता का आखिरी सिरा !
जब भाई मुख मोड़ चुके थे, तब ससुराल से आई एक बेटी ने अपनी माँ और बुआ की सिसकियाँ सुनीं। एक तरफ उसका अपना परिवार था—पति, सास-ससुर और बच्चा—और दूसरी तरफ वह माँ जिसने उसे जन्म दिया । पाँच महीनों के वनवास दौरान उन पाँच महीनों में उस बेटी ने जो झेला, वह शब्द बयान नहीं कर सकते। वह अपनों के बीच पराई हो रही थी और परायों के बीच अपनों को सहेज रही थी। एक तरफ भाइयों की बेरुखी का घाव और दूसरी तरफ जिम्मेदारियों का पहाड़।
चंदा देवी का वो सवाल जो समाज को झकझोर दे !
चंदा देवी की आंखों का पानी अब सूख चुका है, अब वहां सिर्फ जलते हुए सवाल हैं । क्या औलाद सिर्फ़ जायदाद की वारिस है ? अगर बाप की आँखें बंद होते ही माँ की दुनिया का उजाला छीन लिया जाए, तो क्या ऐसी औलाद का होना न होने से बेहतर नहीं ? जो बच्चे आज यह भूल रहे हैं कि उन्होंने अपने माता-पिता के साथ क्या किया, वे शायद यह भूल रहे हैं कि समय का पहिया घूमता है। जो बीज उन्होंने आज बोया है, कल उसका कड़वा फल उन्हें भी चखना होगा । नाता तोड़ना मजबूरी नहीं, फैसला है जब खून ही पानी बन जाए, तो उस रिश्ते को ढोना सिर्फ़ ज़िल्लत है। चंदा देवी का अपने बेटों से नाता तोड़ना उनके गुस्से से ज़्यादा उनके स्वाभिमान और उस गहरी चोट का प्रतीक है जो उन्हें अपनों ने दी है।
“माँ को कतरा भर रोशनी देने से कतराने वाले ये बेटे शायद महलों में रह लें, पर सुकून नहीं पा सकेंगे। क्योंकि जिस घर की जड़ें (माता-पिता) सूख जाती हैं, वहां कभी खुशहाली की छॉंव नहीं आती। ” चंदा देवी का यह संघर्ष हर उस संतान के लिए चेतावनी है जो अपनों को बोझ समझने की भूल कर रहे हैं। याद रखिये, बुढ़ापा कोई बीमारी नहीं, वह भविष्य है जो आपकी दहलीज़ पर भी खड़ा है।
जल्द ही इस मामलें में हम बडा खुलासा करेंगें आखिर क्यों अपनें…..अपनों सें बिछडें … !




