सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला ……..
कोर्ट ने सभी राज्यों को निर्देश दिया कि वे हर जिले में पर्याप्त क्षमता वाले सुसज्जित “एनिमल बर्थ कंट्रोल (ABC) सेंटर्स” स्थापित करें ।

निम्बाहेंडा और चित्तौड़गढ़ नगर परिषदों ने की “पशु जन्म नियंत्रण नियमों की अनदेंखी” !
“चित्तौड़गढ़”कार्यादेश जारी,“निम्बाहेंडा” का कार्य चल रहा है !
आकाश शर्मा
चित्तौड़गढ़ । देश में आवारा कुत्तों और मवेशियों के बढ़ते आतंक पर सुप्रीम कोर्ट ( 2026 INSC 506 ) ने अब तक का सबसे सख्त और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कर दिया है कि नागरिकों और मासूम बच्चों के जीने का अधिकार अनुच्छेद 21 सर्वोपरि है। कोर्ट ने आदेश दिया है कि स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स और बस स्टैंड जैसे संवेदनशील ‘संस्थानिक क्षेत्रों’ से आवारा कुत्तों को तुरंत हटाया जाए और नसबंदी के बाद उन्हें वापस वहां कतई न छोड़ा जाए । सबसे बड़ा झटका उन कुत्ता प्रेमियों और संगठनों को लगा है जो सड़कों पर कुत्तों को खाना खिलाकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते थे । कोर्ट ने साफ कहा है कि जो भी व्यक्ति या संगठन परिसर में कुत्तों को खाना खिलाएगा या संरक्षण देगा, उसे लिखित हलफनामा देना होगा कि यदि उस कुत्ते ने किसी को काटा, तो उसके इलाज और कानूनी नुकसान की पूरी भरपाई उसी व्यक्ति को करनी होगी ।
भीलवाड़ा और चित्तौड़गढ़ के जमीनी हालात भी बनें आधार !
सुप्रीम कोर्ट ने इस 131 पन्नों के विस्तृत फैसले में राजस्थान के मेवाड़ अंचल में बिगड़े हालातों और प्रशासनिक नाकामी का विशेष रूप से संज्ञान लिया है। गौरतलब है कि दैनिक द पुलिस पोस्ट ने लगातार अपनी खोजी कड़ियों के जरिए पशु जन्म नियंत्रण नियमों की अनदेंखी इस जानलेवा लापरवाही को उजागर किया था ।
एक ही दिन में 42 लोगों को नोचा-भीलवाड़ा में आवारा कुत्तों के झुंड ने महज 24 घंटे के भीतर 42 मासूमों और राहगीरों को अपना शिकार बना डाला था। सुप्रीम कोर्ट ने इस भयावह आंकड़े को अपने फैसले के पेज संख्या 99-111 में शामिल कर माना कि स्थिति अब सामान्य नहीं बल्कि ‘हिंसक’ हो चुकी है।
श्रीगंगानगर और चित्तौड़गढ़ के आंकड़े- जिला अस्पतालों में एंटी-रेबीज वैक्सीन की कमी और महज 3 महीनों में (ऑकडें सूत्रों के अनुसार है) 1840 से अधिक लोगों के डॉग बाइट का शिकार होने के है, अदालत ने उन पर मुहर लगाते हुए कहा कि राज्य सरकारें और नगर निकाय अब ‘बजट की कमी’ का रोना रोकर नागरिकों की जान से खिलवाड़ नहीं कर सकते ।
सुप्रीम कोर्ट के 5 सबसे बड़े और कड़े निर्देश ।
नो-रिलीज़ ज़ोन-स्कूलों, अस्पतालों और सार्वजनिक परिसरों से पकड़े गए कुत्तों को नसबंदी और टीकाकरण के बाद वापस उसी जगह नहीं छोड़ा जाएगा । उन्हें नगर निगम द्वारा चिन्हित ‘नामित शेल्टर्स’ में रखा जाएगा ।
कुत्ता प्रेमियों पर सीधी कानूनी कार्यवाही – यदि विश्वविद्यालय परिसरों या आवासीय सोसायटियों में कोई कुत्तों को फीडिंग कराता है, तो उसे पीड़ित को हर्जाना देने का बॉन्ड भरना होगा। अधिकार और जिम्मेदारी साथ-साथ चलेगी ।
8 सप्ताह में घेराबंदी का अल्टीमेटम- सभी सरकारी और निजी शिक्षण संस्थानों तथा अस्पतालों को आदेश दिया गया है कि वे 8 सप्ताह के भीतर मजबूत फेंसिंग और बाउंड्री वॉल का निर्माण सुनिश्चित करें ताकि कोई जानवर अंदर न घुस सके। हर संस्थान में एक ‘नोडल अधिकारी’ तैनात होगा।
राजमार्गों पर 24/7 गश्त- राष्ट्रीय राजमार्गों (NHAI) और एक्सप्रेसवे पर घूमने वाले आवारा मवेशियों को तुरंत हटाकर गौशालाओं में भेजने और 24 घंटे काम करने वाली ‘हाइवे पेट्रोल टीम’ व हेल्पलाइन नंबर जारी करने के आदेश दिए गए हैं ।
मुख्य सचिवों व आयुक्तों पर गिरेगी गाज – यदि इस आदेश के क्रियान्वयन में लापरवाही हुई, तो संबंधित राज्यों के मुख्य सचिवों और नगर निगम/नगर परिषदों आयुक्तों पर सीधे अवमानना और अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी ।
22 सूत्रीय रिपोर्ट कार्ड तलब,प्रशासनिक अमले में हड़कंप !
सुप्रीम कोर्ट ने केवल आदेश ही नहीं दिया है, बल्कि फैसले के अंत में एक सख्त ‘कम्प्लायंस रिपोर्टिंग फॉर्मेट’ भी जोड़ दिया है। इसके तहत अब प्रशासन को हर 6 महीने में यह लिखित हिसाब देना होगा कि कितने कुत्तों की नसबंदी हुई, कितने शेल्टर होम बने और एंटी-रेबीज दवाओं का क्या स्टॉक है । खुलासे के बाद अब जिला प्रशासन और स्थानीय नगर परिषद में हड़कंप मच गया है। सालों से फाइलों में चल रहे एनिमल बर्थ कंट्रोल (ABC) सेंटर्स को अब जमीन पर उतारना प्रशासन की मजबूरी बन गया है, क्योंकि अब मामला सीधे देश की सबसे बड़ी अदालत की अवमानना से जुड़ा है ।
चित्तौड़गढ़ और निम्बाहेड़ा प्रशासन के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी, अब तो जागो हुक्मरानों !
हमारे समाचार पत्र द्वारा जनहित को सर्वोपरि रखते हुए जमीनी और खोजी खबरें प्रकाशित की जा रही हैं। हमने बार-बार तस्वीरों और प्रामाणिक आंकड़ों के साथ स्थानीय प्रशासन का ध्यान पशु जन्म नियंत्रण (एनिमल बर्थ कंट्रोल) अधिनियम और आवारा कुत्तों के जानलेवा आतंक की तरफ खींचने का पुरजोर प्रयास किया । हमारा मकसद फाइलों में दबे पड़े नियमों को धरातल पर लाना और मासूम जिंदगियों को बचाना था । परंतु अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक पहलू यह है कि चित्तौड़गढ़ और निम्बाहेड़ा प्रशासन के कानों पर आज तक जूं तक नहीं रेंगी है। स्थानीय जिम्मेदार अधिकारी गहरी नींद में सोए रहे और जनता आवारा जानवरों के खौफ में जीती रही। हमारी यह खोजी और संघर्षपूर्ण कोशिश असल मायने में तब सफल होगी, जब राज्य सरकार और स्थानीय जिला प्रशासन सुप्रीम कोर्ट के इस चाबुक के बाद समय रहते चेत जाए । अब देखना यह है कि देश की सबसे बड़ी अदालत के इस ऐतिहासिक थप्पड़ के बाद भी चित्तौड़गढ़ और निम्बाहेड़ा का यह लापरवाह प्रशासनिक अमला अपनी कुंभकर्णी नींद से जागता है या फिर अदालत की अवमानना की सीधी कार्रवाई भुगतने का इंतजार करता है । क्या निम्बाहेंडा में जंकु फाउंडेशन द्वारा नियम के अनुरूप सर्वसुविधायुक्त श्वान केंद्र,आधुनिक ऑपरेशन थियेटर, प्रशिक्षित वेटरनरी डॉक्टर्स की टीम,दवाइयां और विशेष डॉग कैचिंग वाहन तैनात कर रखें थें तो स्वागत योग्य है । अगर नही कर रखें थें तों क्या जिला प्रशासन विशेष टीम से इसकी जांच कर सच्चाई सामनें ला पायेगा ! जंकु फाउंडेशन और नगर परिषद अधिकारीयों के खिलाफ कार्यवाही कर पायेगा ये तो आने वाले वक्त में पता चल ही जायेगा ।




