
चित्तौड़गढ़ में भाजपा का विजय रथ….
पान का बीड़ा, काला चश्मा, कुर्सी की जंग पूरी
अब शुरू हुआ असली ‘इम्तिहान’ !
चित्तौड़गढ़ l आखिरकार शहर की जनता का भरोसा रंग लाया, या यूं कहें कि सियासत के ऊंट ने एक बार फिर करवट ले ली। राजनीति में सफर तय करने के लिए मुसाफिर सिर्फ भरोसे पर गाड़ी में बैठता है यह सोचे बिना कि ड्राइवर कौन है। चित्तौड़गढ़ शहर की राजनीति में भी यही हुआ,चेहरे बदले, सियासी समीकरण साधे गए और आखिरकार सत्ता की मलाईदार कुर्सियों सभापति और उपसभापति—तक पहुंचने का सफर तय हो गया। लेकिन जनाब, असली खेल तो अब शुरू हुआ है!
आंकड़ों की बाजी में कौन जीता, कौन हारा ?
सोमवार को हुए सभापति पद के रण में भाजपा के उम्मीदवार अनिल ईनाणी ने बाजी मारी। उन्हें कुल 36 वोट मिले (33 भाजपा + 3 निर्दलीय), जबकि कांग्रेस के पाले में 24 वोट (23 कांग्रेस + 1 निर्दलीय) ही आए। इसके ठीक अगले दिन मंगलवार को उपसभापति पद के चुनाव में भी यही स्क्रिप्ट दोहराई गई, जहां भाजपा के सुदर्शन रामपुरिया ने भी 36 वोट हासिल कर जीत दर्ज की और कांग्रेस के मो. इब्राहिम छिपा (24 वोट) को करारी शिकस्त दी । आंकड़े गवाह हैं कि भाजपा का कुनबा मजबूत साबित हुआ और कमल खिल गया। निकाय चुनाव में जैन और माहेश्वरी समाज को नुमाइंदगी का मौका तो मिल गया, लेकिन इसके साथ ही सुलगते सवाल भी खड़े हो गए हैं क्या चंदेरिया के आमजन के साथ धोखा हुआ है? और शहर के बाकी समाजों की उपेक्षा के जो सुर अब दबे-कुचले सुनाई दे रहे हैं, क्या सत्तासीन दल इन्हें अनसुना कर पाएगा?
अब भाषण नहीं, जमीन पर दिखनी चाहिए इबारत !
अब तक तो पान का बीड़ा दबाए, काले चश्मे के पीछे से राजनीति के पैंतरे चलना और अपने खास अंदाज में बयानबाजी करना एक अलग दौर था। लेकिन कहानी अब पूरी तरह बदल चुकी है। कुर्सी मिल चुकी है, कंधे पर पूरे शहर की जिम्मेदारी है और सामने जनता का कटघरा खड़ा है। चुनाव में जिस विकास के हसीन सपने दिखाए गए थे, जिन विजन डाक्यूमेंट्स की बड़ी-बड़ी बातें हुई थीं अब उन्हें फाइलों के मकड़जाल से निकालकर सीधे धरातल पर उतारने का वक्त आ गया है । जनता बहुत सीधी है, उसे सियासी भाषणों से कोई मतलब नहीं। उसे टूटी सड़कों से निजात चाहिए, नालियों की बद्तर सफाई सुधरनी चाहिए, शहर की बेतरतीब होती ट्रैफिक व्यवस्था पटरी पर आनी चाहिए और हर वार्ड में समान रूप से विकास की गंगा बहनी चाहिए। अब बहानेबाजी के दिन लद गए, जनता को सिर्फ और सिर्फ नतीजे चाहिए !
सभापति जी… अब परीक्षा आपकी है !*
साहब, सफर पूरा हो चुका है, ताज आपके सिर सज चुका है। अब ‘पान का बीड़ा’ आप जितने मर्जी शौक से चबाएं, यह आपका व्यक्तिगत मामला है लेकिन जनता के विकास की पूरी माला अब आपके ही गले में पड़ी है । अब पूरे शहर की निगाहें इसी बात पर टिकी हैं कि आपके इस ‘काले चश्मे’ के पार से शहर के विकास का विजन वाकई साफ-सुथरा दिखाई देता है या नहीं, या फिर वादों की फाइलें एक बार फिर धूल फांकने के लिए छोड़ दी जाएंगी ? कुर्सी तक पहुंचने का रास्ता भले ही जोड़-तोड़ और राजनीति से होकर गुजरा हो, लेकिन कुर्सी पर बैठने के बाद एक-एक काम का हिसाब जनता लेगी ! चित्तौड़गढ़ के विकास का असली इम्तिहान अब शुरू हो चुका है देखना यह है कि यह नया नेतृत्व शहर को उसकी मंजिल तक पहुंचा पाता है या सियासत सिर्फ फाइलों तक ही सिमट कर रह जाती है ?




