देश के माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी……नारा
'एक पेड़ माँ के नाम' दूसरी और माफिया का चलता आरा !

आकाश शर्मा
चित्तौड़गढ़। राजनीति और प्रशासन के दोहरे चरित्र और उनके खोखले आदर्शों का जीवंत प्रमाण देखना हो, तो भादसोड़ा के जंगलों में बिछी हरे पेड़ों की उन ‘लाशों’ को देख लीजिए, जिन्हें लालच की कुल्हाड़ियों ने बेदर्दी से काटा है। एक तरफ सरकारी तंत्र गाजे-बाजे, ढोल-नगाड़ों और कैमरों की फ्लैश लाइट के बीच “एक पेड़ माँ के नाम” लगाने का पाखंड रच रहा है, वहीं दूसरी तरफ उसी माँ स्वरूपा धरती का सीना छलनी करने वाले वन माफियाओं को सत्ता और सिस्टम का अभयदान और मौन संरक्षण प्राप्त है। यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि पर्यावरण के विरुद्ध किया जा रहा एक संगठित और जघन्य ‘नरसंहार’ है। जब रक्षक ही भक्षकों के साथ बैठकर मलाई बाँट रहे हों, तो “हरित राजस्थान” का सपना केवल फाइलों में दबकर दम तोड़ देता है। यह विडंबना की पराकाष्ठा है कि जहाँ एक नन्हे पौधे को पालने के लिए करोड़ों का बजट फूंका जाता है, वहीं दशकों पुराने कीमती पेड़ों को चंद रुपयों की रिश्वत के बदले माफियाओं के आरे के हवाले कर दिया जाता है। प्रशासन की आँखों पर बंधी ‘सुविधा शुल्क’ की पट्टी ने उन्हें इतना अंधा कर दिया है कि उन्हें न तो श्मशान के पास पड़ा लकड़ियों का अवैध जखीरा दिख रहा है और न ही सर्राटे भरते वे कंटेनर, जो इस क्षेत्र की ऑक्सीजन को दूसरे जिलों में बेच रहे हैं।
खाकी और खादी की ‘मौन’ सहमति !
भादसोड़ा बिजली पावर हाउस के पीछे लगा लकड़ियों का अंबार कोई मामूली स्टॉक नहीं, बल्कि पुलिस और वन विभाग की कार्यप्रणाली पर एक बदनुमा दाग है। सवाल यह है कि जब भारी भरकम कंटेनर भरकर लकड़ी अलवर और भरतपुर भेजी जा रही है, तो क्या रास्ते में पड़ने वाली पुलिस चौकियाँ और नाके अंधे हो गए हैं? या फिर ‘चमकते सिक्कों’ ने सिस्टम की आँखों पर पट्टी बाँध दी है? बिना टीपी (परिवहन अनुमति) और बिना वैध लाइसेंस के लाखों का यह काला कारोबार बिना “ऊपर” की मिलीभगत के मुमकिन ही नहीं है ।
श्मशान की ओट में ‘साँसों’ का सौदा !
माफियाओं की ढिठाई देखिए, उन्होंने श्मशान घाट जैसे पवित्र स्थानों को अवैध लकड़ियों का अड्डा बना लिया है। हथियाणा, रामथली, गुड्डा और सुरपुर के जंगलों में आज जो कुल्हाड़ियाँ चल रही हैं, वे कल हमारी ऑक्सीजन और अस्तित्व को काट देंगी। शीशम, नीम और खेजड़ी जैसे प्रतिबंधित और पूजनीय पेड़ों की बलि सिर्फ इसलिए दी जा रही है ताकि कुछ भ्रष्ट अधिकारियों और माफियाओं की तिजोरियाँ भरी जा सकें।
तमाशा देख रहा है प्रशासन !
अखबारों में खबरें छपती हैं, ग्रामीण चिल्लाते हैं, लेकिन साहब के कानों पर जूँ तक नहीं रेंगती। यह ‘सुस्त कार्यशैली’ सीधे तौर पर अपराधियों के हौसले बुलंद कर रही है । जब रक्षक ही मूकदर्शक बन जाए, तो जनता किससे गुहार लगाए? वन अधिनियम की धाराएँ क्या केवल गरीबों को डराने के लिए हैं ? इन बड़े मगरमच्छों पर जाल कब डाला जाएगा ?
ग्रामीणों की चेतावनी !
पर्यावरण से खिलवाड़ प्रकृति के साथ युद्ध है, और याद रहे, प्रकृति जब पलटवार करती है तो कोई भी ‘वीआईपी’ पास काम नहीं आता। प्रशासन को चाहिए कि इस ‘काले साम्राज्य’ को तुरंत ध्वस्त करे, अवैध स्टॉक को जब्त करे और उन चेहरों को बेनकाब करे जो वर्दी की आड़ में इस अवैध कारोबार के भागीदार हैं । अगर अब भी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मान लिया जाना चाहिए कि “एक पेड़ माँ के नाम” अभियान महज़ एक फोटो खिंचवाने वाला इवेंट है, और धरातल पर सच सिर्फ “माफिया का राज” है।




