घर-घर कचरा संग्रहण ठेके की बंदरबांट………
राजनीतिक हस्तक्षेप से योग्य फर्म को किया दरकिनार !

भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा , कमेटी पर सवालिया निशान
आकाश शर्मा
चित्तौड़गढ़। स्वच्छ भारत मिशन के तहत घर घर से कचरा संग्रहण करने के लिए निकाली गई निविदा में नगर परिषद के जिम्मेदारों ने राजनीतिक हस्तक्षेप के दबाव में आकर एक ऐसी फर्म को ठेका जारी कर दिया , जो कि इसके लिए किसी भी तरह से उपयुक्त नही थी। लेकिन परिषद के अधिकारियों ने राजनीति के आगे घुटने टेक कर योग्य फर्म को दरकिनार कर दिया। नगर परिषद क्षेत्र में तीन वर्ष की अवधि का घर घर से कचरा प्रबंधन की व्यवस्था के लिए 18 करोड़ 27 लाख की निविदा आमंत्रित की थी। नियमों की पारदर्शिता औऱ कमेटी के मनमाने निर्णय की जानकारी मिलने के बाद जब स्वायत्त शासन विभाग ने मामले में संज्ञान लेते हुए मुख्य अभियंता ने तथ्यात्मक रिपोर्ट तलब की करीब दो माह बीत जाने के बाद भी नगर परिषद ने रिपोर्ट मुख्यालय को नही भेजी। महज इस राजनीतिक घोटाले को अंजाम देने के लिए बनाई गई कमेटी जिसमे सहायक अभियंता , एग्जीक्यूटिव इंजीनियर एवं सहायक लेखाधिकारी ने सभी नियमों कायदों को ताक में रख कर करोड़ों का ठेका अयोग्य फर्म को करने का निर्णय ले लिया। हालांकि निविदा प्रक्रिया में भाग लेने वाली फर्म की शिकायत के बाद मामला उच्च न्यायालय में विचाराधीन है । फिलहाल अस्थाई तौर पर राजनीतिक आशिर्वाद प्राप्त फर्म को कार्यादेश जारी कर दिया है।
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तकनीकी मूल्याकंन और अंको का गड़बड़ झाला !
नगर परिषद चित्तौड़गढ़ में स्थानीय राजनीति के सामने नतमस्तक होते हुए स्वच्छता के नाम पर करोड़ों रुपये की सरकारी राशि की बंदरबांट करने और एक अयोग्य फर्म को उपकृत करने का एक ऐसा खेल खेला गया है, जिसने राजस्थान लोक उपापन में पारदर्शिता (राजस्थान सार्वजनिक खरीद में पारदर्शिता अधिनियम 2013) के नियमों को खूंटी पर टांक दिया । ₹18.27 करोड़ की भारी-भरकम राशि वाले डोर-टू-डोर कचरा संग्रहण टेंडर” (निविदा संख्या 9875) की फाइलें आज जयपुर मुख्यालय से लेकर स्थानीय गलियारों तक सुलग रही हैं। सरकारी फाइलों से निकले अकाट्य दस्तावेज़ अपनी गवाही खुद दे रहे हैं कि कैसे अयोग्यता के दलदल को अंकों की हेराफेरी से ढक कर अयोग्य को योग्य घोषित करने का सोचा समझा खेल खेला गया ,और जब मामले की जांच बैठी, तो स्थानीय प्रशासन ने मुख्यालय के आदेशों को ही ठेंगे पर रख दिया । तारीख-दर-तारीख इस महा-घोटाले की उस घटनाक्रम को को लेकर चित्तौड़गढ़ से लेकर जयपुर तक हलचल मच गई।
तारीख-दर-तारीख घपले का घटनाक्रम !
14 जनवरी, 2026 कों नगर परिषद चित्तौड़गढ़ द्वारा वार्ड संख्या 1 से 60 में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के तहत इंटरनेट ऑफ थिंग्स -आधारित घर-घर कचरा संग्रहण, पृथक्करण और प्रसंस्करण इकाई तक परिवहन के लिए निविदा सूचना संख्या 9875 जारी की जाती है। अनुबंध की अवधि 3 वर्ष और अनुमानित लागत ₹18,27,00,000 (18.27 करोड़ रुपये) तय की जाती है ।
17 फ़रवरी, 2026 कों तकनीकी बिड के मूल्यांकन के दौरान ही ‘अरहम एनवायरोइन्फ्रा प्राइवेट लिमिटेड’ द्वारा स्वायत्त शासन निदेशालय के निदेशक को एक बेहद गंभीर शिकायत भेजी जाती है। शिकायत में साफ कहा जाता है कि नगर परिषद चित्तौड़गढ़ पूरी प्रतिस्पर्धा को जानबूझकर खत्म कर रही है और एक ‘सिंगल बिडर’ मेसर्स हरि ओम ट्रेडर्स को फायदा पहुंचाने के लिए एक पूर्वनिर्धारित खेल के तहत काम कर रही है । इसी दिन शाम 7 बजकर 4 मिनीट और 32 सेंकण्ड बजे मूल्यांकन समिति के सदस्य जिसमें सहायक अभियंता,एग्जीक्यूटिव इंजीनियर और सहायक लेखाधिकारी द्वारा डिजिटल हस्ताक्षर कर अयोग्य फर्म को पात्र घोषित कर दिया जाता है ।
13 मार्च, 2026 के दिन मेसर्स नागेंद्र राय प्राइवेट लिमिटेड, बांसवाड़ा की शिकायतों और तकनीकी मूल्यांकन में भारी अनियमितताओं का संज्ञान लेते हुए DLB जयपुर के मुख्य अभियंता अरुण व्यास ने कड़ा रुख अपनाया । उन्होंने नगर परिषद चित्तौड़गढ़ के आयुक्त को पत्र पत्रांक 4954 भेजकर आदेश दिया कि वे शिकायत में उठाए गए बिंदुओं की निविदा शर्तों के अनुसार जांच करें और “तथ्यात्मक रिपोर्ट” तुरंत निदेशालय भिजवाएं। मुख्यालय ने स्पष्ट आदेश दिया कि रिपोर्ट आने तक निविदा पर कोई अंतिम निर्णय न लिया जाए।
17 मार्च, 2026 के दिन मुख्यालय के गलियारों में मात्र 4 दिन बाद एक अजीबोगरीब विरोधाभासी खेल होता है। बिना किसी तथ्यात्मक रिपोर्ट के, DLB जयपुर द्वारा नगर परिषद चित्तौड़गढ़ की ई-फाइल (दिनांक 27.02.2026) का हवाला देते हुए न्यूनतम दरदाता (L-1) मेसर्स हरि ओम ट्रेडर्स की दरों को वित्तीय/तकनीकी मंजूरी दे दी जाती है। आवासीय के लिए ₹64 और वाणिज्यिक के लिए ₹120 प्रति माह की दर स्वीकृत कर 3 वर्ष में ₹15,51,13,200 (15.51 करोड़ रुपये) का वित्तीय बोझ डाला जाता है। हालांकि, शातिर प्रशासनिक चाल चलते हुए विभाग इस पत्र पत्रांक 5136 के अंत में लिख देता है कि “राजस्थान सार्वजनिक खरीद में पारदर्शिता अधिनियम के नियमों की पालना और टेंडर शर्तों की वैधता की पूरी जिम्मेदारी नगर परिषद चित्तौड़गढ़ की होगी।”
19 मार्च, 2026 के दिन मुख्यालय को दर स्वीकृति के ठीक दो दिन बाद एहसास होता है कि स्थानीय स्तर पर अधिकारी इस दर स्वीकृति की आड़ में बड़ा खेल करने वाले हैं और 13 मार्च को मांगी गई “तथ्यात्मक रिपोर्ट” को दबाकर बैठे हैं । मुख्य अभियंता अरुण व्यास ने एक और बेहद कड़ा पत्र जारी किया । उन्होंने आयुक्त को सीधे आड़े हाथों लेते हुए लिखा कि ’13 मार्च को चाही गई तथ्यात्मक रिपोर्ट आज दिनांक तक अप्राप्त है और लगातार शिकायतें मिल रही हैं।’ मुख्यालय ने अंतिम आदेश जारी किया कि “उक्त रिपोर्ट पर निदेशालय स्तर से निर्णय होने तक निविदा के संबंध में आगामी कोई कार्यवाही सम्पादित नहीं की जावे।” यानी टेंडर प्रक्रिया पर पूरी तरह रोक लगा दी गई ।
अंकों का वो झोंल जिसने अयोग्यता को ‘पात्रता’ में बदला !
इस घोटाले का सबसे शर्मनाक पहलू स्थानीय तकनीकी मूल्यांकन समिति की कार्यप्रणाली है। सरकारी फाइलों के मिलान से स्पष्ट है कि जिस फर्म मेसर्स हरि ओम ट्रेडर्स का तकनीकी स्कोर शर्तों के अनुसार मात्र 5 अंक होना चाहिए था, उसे समिति के सदस्यों ने कलम की ताकत का दुरुपयोग कर 75 अंक दे दिए ताकि वह पास होने की न्यूनतम सीमा को छू सके ।
टर्नओवर घोटाला ( शर्त 2.4.2 e )- नियम के मुताबिक गत 3 वर्षों का औसत टर्नओवर ₹9 करोड़ होना चाहिए था, जबकि हरि ओम ट्रेडर्स का टर्नओवर मात्र ₹50 लाख था । उन्हें माल खरीद वाले MSME नोटिफिकेशन की आड़ देकर सेवा टेंडर में गलत तरीके से एंट्री दी गई ।
अनुभव का फर्जीवाड़ा ( शर्त 2.4.2 f, g & h )- टेंडर में 3 वर्ष का राजस्थान सार्वजनिक खरीद में पारदर्शिता अधिनियम आधारित कचरा संग्रहण और 12 महीने का यूज़र चार्ज कलेक्शन अनुभव मांगा गया था । फर्म के पास केवल नगर पालिका बड़ी सादड़ी का कार्य आदेश था जो मात्र 4 महीने पुराना जों 01.10.2025 को जारी हुआ था। इसके बावजूद कमेटी ने 0 के बदले 15 अंक लुटा दिए।
वाहनों का झूठ ( शर्त 2.4.2 i )- टेंडर प्रकाशन की तिथि तक 40 इलेक्ट्रिक वाहनों का मालिकाना हक अनिवार्य था। फर्म के पास कोई मालिकाना हक नहीं था, केवल एक एग्रीमेंट और 42 कैमरों का बिल था । कमेटी ने आँखें मूंदकर पूरे 40 अंक दे दिए ।
‘तथ्यात्मक रिपोर्ट’ दबाने वाले चेहरे कौन ?
क्रोनोलॉजी एकदम साफ है। 13 मार्च को जब जयपुर से सर्वोच्च तकनीकी अधिकारी ने साफ कह दिया था कि निविदा शर्तों की जांच की जाए और रिपोर्ट आने तक कोई निर्णय न लिया जाए, तो स्थानीय अधिकारियों ने उस पत्र को ठंडे बस्ते में क्यों डाला ? क्या यह महज लापरवाही थी या फिर 17 मार्च को जयपुर से जारी होने वाले दर अनुमोदन पत्र को हासिल करने की कोई सोची-समझी सांठगांठ ? स्थानीय प्रशासन की यह चुप्पी खुद-ब-खुद कह रही है कि घोटाले की जड़ें बहुत गहरी हैं । सूत्रों का कहना है कि विगत लम्बें समय सें नगर परिषद कें गलियारों व आयुक्त कक्ष में कुछ राजनीतिक चेहरें हमेशा मडरातें देखें गयें है जिसकी पुष्ठी हमारें विशेष सूत्रों नें उन विशेष लोगों की है । दबी जुबान में कर्मचारीयों की कानाफूसी भी सुत्रों ने सुनी जिसमें छुटभयें,सत्ताधारी जनप्रतिनिधी का रौब दिखातें हुए कहतें सुने गये कि काम तों हम और हमारें लोंग ही करेंगें । ऐसे में आयुक्त भी अपनें आप कों असाहय समझनें लगें हॉलाकि आयुक्त नें इस पुरें मामलें में अपनी चुप्पीसाध ली है । इन सब के पीछें किसी बड़े राजनीतिक या प्रशासनिक वरदहस्त की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता ।
राजनीति की प्रयोगशाला बनी नगर परिषद !
शहर के विकास और कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाने वाली नगर परिषद विधानसभा चुनाव के बाद से ही राजनीति की प्रयोगशाला बनी हुई है। विधानसभा चुनाव के बाद से करीब आधा दर्जन से ज्यादा प्रशासक और आयुक्त देख चुकी नगर परिषद में भाजपा की गुट बाजी इतनी हावी हो चुकी है कि , चाह कर भी कोई अधिकारी स्वायत्त शासन विभाग के बने कानून और नियमों के अनुसार कार्य कर ही नही सकता। वही दूसरी और नगर परिषद के कार्मिकों में इस बात का डर सताता रहता है कि , परिषद में गुटीय राजनीति और राजनीतिक हस्तक्षेप इतना ज्यादा हावी हो चुका है कि, कब किस कार्मिक की रवानगी कर दी जाए , यह पूरी परिषद के लिए चौकाने वाली बात हो जाती है।अभी हाल ही में नगर परिषद में नए आयुक्त की नियुक्ति को भी इसी से जोड़ कर देखा जा रहा है। चित्तौड़गढ़ शहर की कांग्रेस और भाजपा की राजनीति देख चुके नव पदस्थापित आयुक्त रविंद कुमार यादव , भाजपा की बढ़ती गुटबाज़ी और दखलंदाजी के बीच कितना और कैसे समन्वय बना पाएंगे , यह तो आने वाला समय ही तय करेगा।
जनता के टैक्स के पैसों की सुरक्षा !
स्वायत्त शासन विभाग के 19 मार्च 2026 के पत्र पत्रांक 5288 ने फिलहाल इस ₹18.27 करोड़ी लूट पर ब्रेक तो लगा दिया है, लेकिन यह इस मामले का पटाक्षेप नहीं है । यह चित्तौड़गढ़ की जनता के टैक्स के पैसों की सुरक्षा का सवाल है । यह लड़ाई तब तक अधूरी है जब तक कि तकनीकी मूल्यांकन में अंकों का झोंल करने वाली स्थानीय कमेटी के सहायक अभियंता,एग्जीक्यूटिव इंजीनियर और सहायक लेखाधिकारी के खिलाफ भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) में प्राथमिकी दर्ज नहीं होती और निविदा को पूर्णतः निरस्त कर नए सिरे से पारदर्शी प्रक्रिया नहीं अपनाई जाती। हम घोटाले के हर एक चेहरे को बेनकाब करने के लिए प्रतिबद्ध है। फाइलें खुल चुकी हैं दोस्तों यें टाईटल था पिक्चर पुरी बाकी है । अगला पार्ट पढना ना भुलें इससें और भी धमाकेदार होगा । यह पूरी रिपोर्ट शिकायकर्ता और सरकारी दस्तावेंजों पर आधारित है ।




