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राजस्थान भाजपा में ‘महा-सर्जरी’ की आहट !

क्या लौटेगा राठौड़-जोशी का स्वर्णिम युग !

आकाश शर्मा 

राजस्थान की मरूधरा पर सियासी पारा एक बार फिर उफान पर है। लेकिन इस बार गर्मी मौसम की नहीं, बल्कि भाजपा के भीतर पक रही उस खिचड़ी की है जिसकी खुशबू दिल्ली से लेकर जयपुर तक महसूस की जा रही है। सूत्रों की मानें तों  राजनीतिक गलियारों में चर्चा आम है कि बंगाल चुनाव के नतीजों के बाद राजस्थान भाजपा में एक ऐसी ‘महा-सर्जरी’ होने वाली है, जो सत्ता और संगठन के पूरे ढांचे को बदल कर रख देगी ।

क्या फिर मचेगा ‘हुंकार’ का डंका  !  

सियासत के चाणक्य और अपनी आक्रामक कार्यशैली के लिए मशहूर राजेंद्र राठौड़ के नाम की चर्चा प्रदेशाध्यक्ष के रूप में फिर से तेज हो गई है। यह केवल एक पद का बदलाव नहीं, बल्कि 2028 के ‘रण’ के लिए सेनापति का चुनाव है । भाजपा आलाकमान शायद यह समझ चुका है कि कांग्रेस के आक्रामक तेवरों को कुंद करने के लिए उसे एक ऐसे चेहरे की जरूरत है जिसकी पकड़ कार्यकर्ताओं की नब्ज पर हो और जो सदन से लेकर सड़क तक विपक्ष को पछाड़ने का माद्दा रखता हो । राठौड़ का अनुभव और उनकी ‘मास्टर-स्ट्रोक’ वाली राजनीति उन्हें इस रेस में सबसे आगे खड़ा करती है ।  राठौड़ के पास विधानसभा में फ्लोर मैनेजमेंट और कार्यकर्ताओं के बीच सीधा संवाद करने की अद्भुत क्षमता है। पिछले कुछ समय से उनकी सक्रियता और दिल्ली दौरों ने इस सुगबुगाहट को हवा दी है। 

संगठन के ‘साइलेंट’ रणनीतिकार की वापसी !

दूसरी तरफ, चित्तौड़गढ़ के सांसद सी.पी. जोशी का नाम एक बार फिर सत्ता के सबसे बड़े रणनीतिकार के रूप में उभर रहा है। जोशी की सौम्यता और संगठन के प्रति उनकी निष्ठा उन्हें ‘दिल्ली दरबार’ का सबसे भरोसेमंद चेहरा बनाती है । सूत्रों की मानें तो उन्हें सरकार और संगठन के बीच उस ‘पुल’ की जिम्मेदारी दी जा सकती है, जिसकी कमी फिलहाल महसूस की जा रही है । क्या जोशी एक बार फिर ‘किंगमेकर’ की भूमिका में नजर आएंगे ? चित्तौड़गढ़ सांसद और पूर्व प्रदेशाध्यक्ष के रूप में सी.पी. जोशी का कार्यकाल संगठन की दृष्टि से सफल माना गया था । 

पावर सेंटर्स के बीच संतुलन सबसे बड़ी चुनौती !

इस संभावित बदलाव के बीच सबसे बड़ा सवाल उन ‘पॉवर सेंटर्स’ का है जिन्होंने दशकों से राजस्थान भाजपा की दिशा तय की है। वसुंधरा राजे का कद और उनके समर्थकों की फौज को दरकिनार करना किसी भी नेतृत्व के लिए जोखिम भरा हो सकता है। वहीं, किरोड़ीलाल मीणा जैसे कद्दावर नेता, जो अपनी बेबाकी के लिए जाने जाते हैं, उन्हें साधे बिना ‘मिशन 2028’ की डगर आसान नहीं होगी । क्या भाजपा हाईकमान इन दिग्गजों को एक ‘नया रोल’ देने की तैयारी में है  ? या फिर इस नए बदलाव से ‘बगावत’ की नई इबारत लिखी जाएगी ?

तस्वीर और तकदीर दोनों बदल सकता !

यदि राठौड़ और जोशी की यह ‘जुगलबंदी’ धरातल पर उतरती है, तो यह राजस्थान में ‘राजपूत-ब्राह्मण’ के उस पुराने और सफल सामाजिक समीकरण को पुनर्जीवित करेगी, जिसने पार्टी को हमेशा मजबूती दी है। यह महज एक चर्चा नहीं, बल्कि आने वाले उस राजनीतिक तूफान का संकेत है जो राजस्थान भाजपा की तस्वीर और तकदीर दोनों बदल सकता है। अब देखना यह है कि बंगाल चुनाव के बाद दिल्ली से जो फरमान निकलेगा, वह किनकी किस्मत चमकाएगा और किनके राजनीतिक भविष्य पर ग्रहण लगाएगा ।

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