‘मलाई’ के चक्कर में भाजपा के दो गुटों के बीच की जंग !
क्या यें चक्रव्यूह भेद पाएंगे नए आयुक्त रविंद्र यादव !

रिपोर्ट-आकाश शर्मा
चित्तौड़गढ़। विधानसभा चुनाव के बाद से ‘आयुक्तों की म्यूजिकल चेयर’ बनी नगर परिषद अब सियासी अखाड़ा बन चुकी है। आधा दर्जन प्रशासकों के बदलने के बाद नवनियुक्त आयुक्त के पदभार ग्रहण करते ही भाजपा की आंतरिक गुटबाजी की सड़ांध सड़कों पर आ गई है। अपनों को ‘उपकृत’ करने की भूख इतनी बढ़ गई है कि परिषद के कर्मचारी अब काम नहीं, बल्कि दो गुटों के बीच अपनी गर्दन बचाने की ‘चक्करघिन्नी’ बने हुए हैं।
पुत्र मोह और ‘कमीशन’ का खेल साख दांव पर !
शहर की राजनीति के स्वयंभू दिग्गज कहे जाने वाले नेता अब जनसेवा छोड़कर ‘पुत्र मोह’ की चाशनी में डूबे हैं । नगर परिषद में टेंडर हथियाने के लिए जिस तरह की हाथ-पैर मारने वाली राजनीति हो रही है, उसने संगठन की साख पर बट्टा लगा दिया है। चर्चा है कि स्वच्छ भारत मिशन से लेकर निर्माण कार्यों तक, हर फाइल पर किसी न किसी ‘खास’ का ठप्पा लगवाने की होड़ मची है। डर इस बात का है कि नेताओं की इस मलाई वाली जंग में बेचारे कर्मचारियों की बलि चढ़ना तय है ।
कचरे में ‘सोना’ तलाशते रसूखदार !
घर-घर कचरा संग्रहण: सेवा कम, मेवा की होड़ ज्यादा शहर के हजारों टन कचरे के प्रबंधन के लिए स्वच्छ भारत मिशन के तहत करोड़ों के टेंडर ने परिषद में भूचाल ला दिया है । यह सिर्फ कचरा उठाने का ठेका नहीं, बल्कि वर्चस्व की लड़ाई बन चुका है । आलम यह है कि राजनीतिक दबाव में लिए गए फैसलों के कारण मामला अब न्यायालय की दहलीज तक जा पहुँचा है। सूत्र बताते हैं कि भाजपा के दोनों गुट इस टेंडर में अपनी हिस्सेदारी तय करने के लिए ‘साम-दाम-दंड-भेद’ का सहारा ले रहे हैं ।
18 करोड़ की निविदा और संगठन में ‘दरार’ !
टेंडर ने बढ़ाई अपनों के बीच कड़वाहट करीब 18 करोड़ रुपये की भारी-भरकम निविदा ने संगठन के पदाधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के बीच तलवारें खिंचवा दी हैं । उच्च स्तरीय राजनीतिक हस्तक्षेप के बावजूद, कोई भी गुट पीछे हटने को तैयार नहीं है । संगठन के आदर्शों की बातें हवा हो चुकी हैं और अब सिर्फ ‘येन-केन-प्रकारेण’ हिस्सेदारी पक्की करने की जुगाड़बाजी चल रही है। यह तल्खी अब बंद कमरों से निकलकर गलियारों में चर्चा का विषय है ।
कांटों के ताज पर नवनियुक्त आयुक्त !
रविंद्र यादव के पाले में गेंद, क्या बच पाएंगे गुटीय राजनीति से ? कांग्रेस और भाजपा, दोनों सरकारों में अहम जिम्मेदारियां निभा चुके अनुभवी आयुक्त रविंद्र यादव के लिए यह कार्यकाल किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होगा। एक तरफ करोड़ों के टेंडर की बंदरबांट है, तो दूसरी तरफ भाजपा के दोनों गुटों का खुला विरोध। दिग्गज नेता उनकी नियुक्ति को लेकर पहले ही मोर्चा खोल चुके हैं। बड़ा सवाल यह है कि क्या आयुक्त महोदय इन ‘सियासी सूरमाओं’ के दबाव में झुकेंगे या नियम-कायदों की ढाल बनाकर भ्रष्टाचार के इस खेल को रोक पाएंगे? फिलहाल तो गेंद उनके पाले में है, लेकिन रास्ता ‘टेढ़ी खीर’ से भी ज्यादा मुश्किल नजर आ रहा है। सियासी गलियारों में चर्चा है कि अगर यही हाल रहा, तो परिषद विकास के बजाय विवादों का केंद्र बनकर रह जाएगी। अब देखना यह है कि ‘पार्टी विद अ डिफरेंस’ का नारा देने वाले चित्तौड़गढ़ के ये ‘माननीय’ परिषद को लूट से बचाते हैं या खुद लूट में शामिल होते हैं !




